Monday, October 20, 2008

जिनदर्शन

आइए जिनदर्शन के लिए मंदिर चलें। पहले नहा-धो लें। साफ-सुथरे और सादे कपड़े पहन लें। असल में पवित्रता, सादगी और सीधापन, मंदिर में जाने से पहले कुछ हद तक हममें आ जाना चाहिए। दर्शन तभी संभव है। मंदिर पहुँचने से पहले रास्ते में कोई और काम हम न करें। निष्काम होने निकले हैं, तो सब कामों से मुक्त होना जरूरी है। सारा रास्ता भगवान के दर्शन की प्यास के साथ गुजरे, उनके गीत गाते हुए गुजरे। ऐसा लगे मानो आज हम अपने किसी अत्यंत प्रिय अभिन्न सखा से मिलने जा रहे हैं। अपना सबकुछ समर्पित करने जा रहे हैं। हाथ श्रेष्ठ चावलों से भरे हैं और हृदय गहरे समर्पण से भरा है। मंदिर के द्वार पर पहुँच कर हम पहले पैर धो लें, मन का व्यर्थ बोझ उतार कर रख दें, और अनुभव करें कि अनाहत गूँजती दिव्य ध्वनि से व्याप्त श्री भगवान के समवसरण में प्रवेश के क्षण आ गए हैं। बाहर दालान में लगे घंटे की धीमी-धीमी ध्वनि सुनकर मन शांत पवित्र हो गया है। मानो बाहर का सारा कोलाहल यहीं छूट गया है। अब तो प्राणों में एक ही आवाज गूँज रही है- ओम्‌ जय जय जय, नमोऽस्तु नमोऽस्तुनमोऽस्तु......
रोम-रोम आनंद से भरकर सिहर उठा है। श्री भगवान को सम्मुख पाकर हम श्रद्धा से झुकते चले जा रहे हैं। जमीन से माथा टेक कर हम पहला प्रणाम निवेदित करें। फिर संभलकर खड़े होकर श्री भगवान्‌ की वीतराग छवि को अपलक देखते-देखते एकतान होकर अंतस्‌ वीणा पर जो स्वर गूँजे उन्हें ही शब्दों का रूप देते चले जाएँ। वाणी से अपने आप भगवान का स्तवन फूट पड़े। हम पुनः उनके श्री चरणों में माथा टेक कर अहं को विसर्जित करने के लिए दूसरा प्रणाम निवेदित करें। अपने साथ लाए चावलों से भरी अँजुलि खोलकर अपना सर्वस्व समर्पित कर दें। ये चावल प्रतीक है कि हमारा जीवन भी इन्हीं की तरह उज्ज्वल, अखंड और आवरण से रहित हो सके, हम जन्म मरण से मुक्त हो सकें। अब पुनः संभलकर हम नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें और भगवान के चरणों में झुककर तीसरा प्रणाम निवेदित करें।
दर्शन की यह समग्र प्रक्रिया भावात्मक हो। शेष वेदिकाओं पर भी ऐसे ही तीन भावात्मक प्रणाम निवेदित करें। यथासंभव, हर वेदिका पर कम-से-कम मन-वचन-काय तीनों को प्रभुमय करते हुए उनके गुणों की प्राप्ति के लिए एक प्रणाम-जरूर निवेदित करें। मानिए, जिन-दर्शन हमारी समग्र चेतना को रूपांतरित करने का अनोखा रसायन है। भाव-दशा को निर्मल बनाने का कीमिया है।

No comments: