मुझको चलने दो अकेला, यूं ही चले मेरा सफर
रास्ता रोका गया तो काफिला बन जाऊंगा...
Monday, October 20, 2008
कविता
गिरगिट ......! जिस वक्ता में धन-कांचन की आस औरपाद पूजन की प्यासजीवित है,वहजनता का जमघट देखअवसरवादी बनता हैआगम के भाल परघूँघट लाता हैकथन का ढँगबदल देता है,जैसेझट सेअपना रंगबदल लेता हैगिरगिट।
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