Monday, October 20, 2008

जिन मंदिर

हमारा जीवन मंदिर की तरह है। आत्मा की वीतराग अवस्था ही देवत्व है। हम सभी में वह देवत्व शक्ति विद्यमान है। अपनी इस देवत्व शक्ति को पहचानकर उसे अपने भीतर प्रकट करने के लिए हमने बाहर मंदिर बनाए हैं और उनमें अपने आदर्श वीतराग अर्हंत और सिद्ध परमात्मा को स्थापित किया है।
हम जानते हैं और रोज देखते भी हैं कि घर तो पशु-पक्षी सभी बना लेते हैं; लेकिन मंदिर मनुष्य ही बना पाता है। मंदिर के विज्ञान से जो लोग परिचित हैं, और जो मंदिर की कला को जानते हैं, यदि हम उनसे पूछें तो ज्ञात होगा कि मंदिर का गुंबज हो चाहे मंदिर के छोटे-छोटे कलात्मक खिड़की-दरवाजे हों, अथवा मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगे हुए विशाल घंटे हों, या कि भगवान के सम्मुख समर्पित किए जाने वाले दीप, और अष्ट द्रव्य हों, सबका संबंध कलात्मकता और गहरी वैज्ञानिक सूझबूझ से है।
गुंबज से टकराकर गूँजती ॐकार की ध्वनि, घंटे का धीमा-धीमा नाद, अभिषेक और पूजा के भाव-भीने स्वर सभी में वातावरण को पवित्र बनाने की सामर्थ्य छिपी है। सवाल यह है कि कौन मंदिर में प्रवेश पाकर अपने आत्म-प्रवेश का द्वार खोल पाता है।
मंदिर में विराजे भगवान की वीतराग छवि को देखकर अपने रागद्वेष के बंधन को क्षण भर के लिए छिन्न-भिन्न कर देना और अहंकार को गलाकर अपने आत्म-स्वरूप में लीन होने के लिए स्वयं भगवान के चरणों में समर्पित करते जाना ही जिन मंदिर की उपलब्धि है।

No comments: