गौशाला
दाँतों तले तृण दाब कर दीन गायें कह रहीं,
हम पशु तुम हो मनुज पर योग्य क्या तुमको यही।
हमने तुम्हें माँ की तरह है दूध पीने को दिया।
देकर कसाई को हमें तुमने हमारा वध किया।
क्या वश हमारा है भला हम दीन हैं बलहीन हैं।
मारो कि पालो कुछ करो, तुम हम सदैव अधीन है।
प्रभु के यहाँ से सभी कदाचित आज हम असहाय हैं।
इससे अधिक अब क्या कहें हाँ हम तुम्हारी गाय है।
जारी रहा यदि यही क्रम यहाँ यों ही हमारे नाश का।
तो अस्त समझो सूर्य भारत भाग्य के आकाश का।
जो तनिक हरियाली रही वह भी नहीं रह पाएगी।
यह स्वर्णभूमि कभी मरघट ही बन जाएगी।
- मैथिलीशरण गुप्त
जो गाय अपनी स्वस्थ अवस्था में हमें अमृत समान दूध देती है, खेती के लिए बैल देती है, ईंधन के लिए गोबर देती है और जिसका मूत्र औषधियों में काम आता है, उसी गाय को लोग वृद्ध होने पर जंगल में छोड़ देते हैं, जहां से उसे कुछ लोग पकड़कर बूचड़खानों में कत्ल होने के लिए बेच देते हैं। कई बार ऐसी गायों को सीधे ही बूचड़खानों में भेजे जाने के लिए बेच दिया जाता है।मानवीय आधार पर ऐसी गायों की देखभाल के लिए और उनका शेष जीवन भी शांतिपूर्वक गुजरे, इस भावना के साथ मुनिश्री विद्यासागरजी के मार्गदर्शन में गौशालाओं का संचालन किया जा रहा है। इन गौशालाओं में उन गायों को रखा जाता है जो दूध नहीं देती और जिन्हें उनके मालिकों द्वारा छोड़ दिया जाता है या जिन्हें बूचड़खाने ले जाए जाने से बचाया जाता है। आप भी ऐसी गायों का जीवन बचाने में अपना सहयोग दे सकते हैं।
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